बुधवार, 25 मार्च 2020

बिना गांठ की रस्सी (Knotted cord)

एक दिन सूर्योदय के समय भगवान बुध के सभी शिष्य उनके प्रतीक्षा में बैठे हुए थे, क्योंकि की प्रवचन का समय हो गया था । कुछ ही देर प्रतीक्षा के उपरांत महात्मा बुद्ध जी अपने दो चार शिष्यों के साथ प्रवचन स्थल पर आते हैं । उनके स्वागत के लिए वहां उपस्थित सभी बौद्ध भिक्षु खड़े होकर उनको प्रणाम करते हैं ।


महात्मा बुध जी अपने हाथों में एक रस्सी लेकर आए, वे अपने आसन पर बैठते ही सबको रस्सी को दिखाते हुए उसमें गांठ बांधने लगे, गांठ बांधने के बाद अपने शिष्यों से बोले क्या वह वही रस्सी है जो मैंने थोड़ी देर पहले तुम्हें दिखाया था ? एक शिष्य हाथ जोड़कर कहा भगवान रस्सी तो वही है पर उसमें गांठ पड़ जाने के कारण वह अपना मूल रूप खो चुका यदि इसमें से गांठ खोल दिया जाए तो वाह अपना मूल रूप में आ जाएगा ।


 बुद्ध जी ने रस्सी का दोनों सिरा को पकड़ कर जोर से खींचने लगे गांठ खोलने के बजाय और भी कस के, इस पर एक शिष्य ने कहा हे भगवान ऐसे यदि इसे ऐसे खींचा जाएगा तो गांठ खोलने के बजाय और भी कस जाएगा और बाद में इसे बोलने में बहुत ही परिश्रम करना पड़ेगा । रस्सी के गांठ को खोलने के लिए गांठ को ध्यानपूर्वक देखना होगा की गांठ किस तरह का है कौन सा भाग किधर से खींचने से खुल सकता है ।


 तब जाकर गांठ खुलेगी और रस्सी अपने मूल स्वरूप मैं आ जाएगी । उस शिष्य की  बातें सुनकर महात्मा बुध बहुत प्रसन्ना हुए, और सभी शिष्यों को संबोधित करके बोलने लगे । हमारी जीवन एक रस्सी की तरह और इसमें लगी गांठ हमारी उसके मुश्किलें है यदि हम बिना सोचे समझे रस्सी के गांठ यानी अपने जीवन की मुश्किलों के साथ रस्सी की तरह व्यवहार करेंगे तो मुश्किलें कम होने के वजाए और भी ज्यादा बढ़ सकती है ।


यदि हम शांत चित्त से सोच समझकर उस मुश्किलों का सामना करेंगे तो जिंदगी की सारे मुश्किलों को खत्म कर बिना गांठ की रस्सी की तरह अपने जीवन को आसानी से जी पाएंग । इससे यही सीख मिलती है कि जी अपने मुश्किलों से जी चुराने की  बजाय, जोर आजमाइश करने के बजाए शांत भाव से सोच समझकर उसका हल निकालने की कोशिश किया जाए तो मानव जीवन जीना बहुत आसान हो जाएगा ।

मंगलवार, 24 मार्च 2020

कुछ साथ जाता है ? मरने के बाद ! Does something go together? After death !

जब तक कोई मनुष्य जिंदा रहता है , तब तक वह हाय घर, हाय पैसा यही सब में लगा रहता है, उसे  लगता है कि यह सदा के लिए मेरे पास रहने वाला है, पर प्रकृति गतिशील हम मनुष्य को पता होने के बाद भी पता नहीं चलता हमारे यह शरीर जिस पंच तत्वों से बना है तत्व में विलीन हो जाता है यह उसी दिन तय हो जाता है, जिस दिन मनुष्य का यह कोई भी प्राणी का जन्म होता है । उसके बाद भी प्राणी इस माया मोह मैं  बह कर वह काम करता है, जो उसे नहीं करना चाहिए वह सांसारिक उपभोग के वस्तुओं को पाने की लालसा में कितनी भी नीच कर्म करने से नहीं चूकते ।


 वह माया मोह के चक्कर में पढ़कर कोई भी हालात में पैसा कमाना चाहता है, जिसे वाह अपने और अपने बीवी बच्चों के लिए सारी उपभोग की वस्तु घर, मोटर, चल अचल संपत्ति बनाता रहता है । उसे लगता है यह सब मेरा है । उसे यह पता नहीं होता कि सांस रुकते ही मुझे चला या दफना दिया जाएगा । धन दौलत दूर की बात है , मृतक के शरीर मैं कफन को छोड़कर बीपी बस्त्र नहीं होगा जितने भी धातु जैसे सोना चांदी आदि के समान होंगे वे सब उतार लिया जाएगा ।


  भी धागा नहीं रहने दिया जाएगा फिर भी मनुष्य की धन दौलत से इतना प्यार ? जिंदा रहते जितने सगे संबंधी आते जाते रहते साथ बैठकर चाय पानी पिया करते मरने के बाद वह भी यही कहते सुना जा सकता है की कितनी देर बाद लाश को घाट ले जाया जाएगा उन्हें अब आप से कोई मतलब नहीं है क्योंकि आपके शरीर से आत्मा रूपी परमात्मा निकल चुके हैं अभी शरीर का कोई महत्व नहीं रहा अब तो उसे इस बात की चिंता सता रही होगी की मृत शरीर से दुर्गंध ना आना शुरू हो जाए ।


 जितने भी बेटा, बेटियां, बहुएं, पत्नी आपके मरने के बाद यही कहते हुए सुना जा सकता है की वे पैसा कहां रखकर गए हैं कितने पैसा रखे हैं चाबी कहां है जमीन के कागजात सब कहां हैं उन्हें आपके मरने से ज्यादा आपके कमा कर रखे हुए धन दौलत की चिंता है की उसमें से मेरा हिस्सा कितना होगा । और जब क्रिया कर्म की बारी आता है तो आप ही के कमाए हुए पैसे से थोड़ा सा दान दक्षिणा देने में कोताही करते हैं । यदि यह शरीर नश्वर है तो इस शरीर का इतना घमंड क्यों ? यदि धन-संपत्ति साथ नहीं जाएगा तो बेईमानी से कमाने से क्या फायदा ।

 रुपया इस युग में जीने के लिए जरूरी है पर उस रुपए को मेहनत से भी तो कमाया जा सकता है, धन दौलत हमारी जरूरत है हमें हर एक काम के लिए पैसे चाहिए होते हैं चाहे खाने पीने के लिए हो, घर मकान बनाने के लिए, बाल बच्चे को पढ़ाने लिखाने के लिए हो उसके बाद भी हमें पैसे को अपनी कमजोरी नहीं बनाना नहीं चाहिए । यदि आपको ज्यादा पैसा कमाना है तो मेहनत करो भगवान ने सोचने के लिए दिमाग और मेहनत करने के लिए हाथ पैर दिए हैं सोच समझकर मेहनत करके क्यों ना कमाया जाए । हर एक मनुष्य को अच्छे कर्म करना चाहिए क्योंकि अच्छे कर्म ही साथ जाते हैं, इसलिए तो इस कलयुग को कर्म प्रधान कहा गया है ।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

वो सावन के गीत

गीत शब्द सुनते ही हमारे मन में वह गांव की उन महिलाओं का दृश्य उभर कर सामने आता है , जो शादी ब्याह के रस्मों में , बच्चों के जन्मदिन पर और धान  रोपने के गाती गीत मन को मोह लेने वाली होती थी ।

ग्रामीण क्षेत्रों में सावन के महीनों में गांव की महिलाएं एक साथ सुर में सुर मिला कर रिमझिम पड़ती बूंदों के साथ और वर्षा से बचने के लिए पत्ता या पॉलिथीन का घोंघ ओढ़ कर धान रोपनी की गीत गाती थी तो लगता था की सावन अपने पूरे शबाब पर है ।

सावन भी मानो उनके को सुनकर इतरा इतरा कर बरस रही हो । दिन भर झुककर धान रोकने की इस गीत से थकान मिट जाता था । गीत और पानी की बूंदों के साथ और एक आवाज फिजाओं में गूंजती थी वह था हरवाहा (हल चलाने वाला) की आवाज जो अपने बैलों को हांकने में व्यस्त रहता था हा हा चल चल उसके आवाज के साथ मानो बैलों की घंटियां भी ताल से ताल मिला रही हो ।

जिन किसानों के घर से खाना आ गया हो वह इस बारिश में छाता लेकर खेत के आर मैं बहुत मजे से खाना खा रहा हो जो भी रूखी सुखी घर से आया हो । उस बारिश के पानी में भीगने से अभी की तरह ना तो सर्दी खांसी होती थी नहीं कोई दिक्कत होता था ।

 पर वह दिन अब कहां अभी तो हल जगह नई तकनीक ट्रैक्टर ने ले ली है और धान रोपने वाली महिलाएं भी लगता है गीत गाना भूल गई है ।

सीता जी को रामजी से मुंह दिखाई में क्या मिला था ?

क्या आप जानते हैं भगवान विष्णु जी को नरसिंह अवतार क्यों लेना पड़ा था ?

चरित्र

क्या आप जानते हैं ? हनुमान जी को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है।

रामायण की रोचक कहानियां- राम बड़ा या राम का नाम ?

क्यों रहना पड़ा था सीता जी को श्री लंका में 

शनिवार, 14 दिसंबर 2019

सीता जी को रामजी से मुंह दिखाई में क्या मिला था ?

जब श्री राम और सीता जी की शादी हुई और सीता  जी अपने ससुराल आ गई । सीता जी के साथ उनकी तीन बहने और राम जी के तीनो भाई भरत ,लक्ष्मण, और शत्रुघ्न भी घर आ गए । विवाह का समय ऐसे ही चहल पहल रहता ही है, उसमें भी चार चार जोड़ों की शादियां इसमें सबका खुशी चार गुनी बढ़ गई । सब हर्ष उल्लास के साथ विवाह का जश्न मना रहे थे पूरे अयोध्या नगर मैं ढोल नगाड़े बज रहे थे, वहां की औरतें बधाइयां गा रही थी ।


उत्सव ऐसा था कि इस उत्सव में शामिल होने के लिए देवता भी इस लालाहित थे । खाने-पीने की कमी नहीं थी जगह-जगह पर खाने पीने की व्यवस्था थी । प्रजा बहुत खुश थी होता भी क्यो नही उनके चहेते राजकुमारो की विवाह का उत्सव था, खास करके श्रीराम की विवाह की । क्यो कि सब जातने थे की श्री राम रघुकुल दीपक अयोध्या के भावी सम्राट है। राम के प्रति अयोध्या वासियों का अथाह स्नेह देख कर लगता था , कि उन्हे राजा के रूप में कोई खजाना मिलने वाला हो ।



वे सब उन्हे राजा बनते देखना चाहते थे।  तीनो माताओं सबसे लाडला श्री राम ही थे, पिता दशरथ जी की तो श्री राम  की शांत स्वभाव गुरुजनो के प्रति आदर छोटो के प्रति स्नेह और प्रजा की पुत्र वत ध्यान रखना ये सब गुण देख कर दशरथ जी खुशी से मंत्रमुग्ध हो जाते, गर्व सर ऊँचा हो जाता है। ऐसे भी यदी बेटा  कोई अच्छा काम करता हो तो देश दुनियाँ मे उनका यस फैल जाता है यहां तो राम जी गुणों की खान है , एक बाप के लिए और क्या चाहिए दूसरे के मुख से अपने बेटे की प्रशंसा सुनकर राजा दशरथ खुशी से फूली नहीं समाते , दशरथ जी को एक नहीं चार चार गुणवान पुत्रों का पिता होने का गौरव प्राप्त था । शादी के बाद जो भी नेग होना था वह सब हुआ ।



 अब बारी था मुंह दिखाई का हमारे भारतवर्ष में शादी के बाद पहली बार बहू (नई दुल्हन) घर आती है तो उसके ससुराल वाले बहू  को कुछ उपहार देते हैं ,जिसे मुंह दिखाई कहां आता है । यह रस्म भारत में लगभग सभी समुदायों में मनाया जाता है । सीता जी के साथ भी वही रस्म निभाया गया राजा दशरथ जी ने अपने सभी पुत्र बंधुओं को अपनी इच्छा अनुसार उपहार दिए । तीनों सासुओ ने भी सीता जी को उपहार भेंट किए । जितने भी लोग राजा , महाराजा,  प्रजा जो भी इस विवाह में शामिल हुए सब ने सीता जी को कुछ ना कुछ उपहार दिए ।


जब रात को श्री रामजी महल में गए तो सीता जी से उनकी मुलाकात हुई ।रामजी सीता जी से बोले सीते आपको सबने कुछ ना कुछ उपहार मुंह दिखाई स्वरूप दिए पर हमने आपको कुछ नहीं दिया यह बात आपको भी ठीक नहीं लग रहा होगा । पर ऐसा बात नहीं है मैं आपको मुंह दिखाई का उपहार जरूर दूंगा । हमारे यहां राजा महाराजाओं में एक बहू पत्नी का प्रथा है जिसमें राजा एक से अधिक शादियां कर सकता, पर मैं आपको वचन देता हूं की कोई दूसरी शादी नहीं करूंगा । आपके सिवा मेरी जिंदगी में कोई नारी नहीं आएगी यही आपको मेरे तरफ से मुंह दिखाई का उपहार है ।

शनिवार, 26 अक्टूबर 2019

क्या आप जानते हैं भगवान विष्णु जी को नरसिंह अवतार क्यों लेना पड़ा था ?



बात उस समय की है जब पृथ्वी पर दो असुर भाइयों का उत्पात चरम सीमा पर था । इन असुरो में बढ़ा का नाम हिरनाकश्यप और छोटे का हिरणाख्य था।आज हम बात कर रहे है बड़े  भाई हरनाकयशप की।
यह दोनों बहुत ही बलशाली असुर थे यह अपने राज्य में यह घोषणा करवा दी थी कि भगवान की पूजा कोई ना करें मैं ही भगवान हूं सब कोई मेरी पूजा करें विशेष कर विष्णु जी से  ज्यादा नफरत करते थे ।क्यों की बिष्णु जी ने ही उसके भाई हिरणाख्य को बरहा अवतार ले कर मारा था।ये असुर कितने वलसाली थे इस बात से ही अंदाजा लगाया जा सकता है की दो भाइयो को मारने के लिए भगवन को दो बार अवतार लेना पड़ा। इस
असुर ने संसार में इतना भयंकर उत्पात मचाया था की ऋषि मुनि देवी देवता मनुष्य सब त्राहिमाम त्राहिमाम कर रहे हैं सबको लगा अब क्या होगा हमें इस दुष्ट  से कौन छुटकारा दिलाएगा ऋषि मुनि सब यज्ञ,जाप,ध्यान,पूजा अर्चना नहीं कर पा रहे थे कोई भी काम जिसमें भगवान की आराधना हो उसके राज्य में निषेध था। यदि उन्हें एवं के सैनिकों को यह पता चल जाता कि फलाने जगह पर भगवान की आराधना पूजा हवन हो रहा हो तो वहां जाकर वे  मारकाट मचा देते और कहते भगवान की पूजा क्यों कर रहे हो हमारे राजा ही हमारे और सबके भगवान हैं, उन्ही की पूजा करो।ऐसी प्रताडना से प्रजा त्राहिमाम - त्राहिमाम कर रही थी पर क्या किया जाए जो उसे सता रहे थे उन्हें परास्त करना किसी देवी देवता या किसी मनुष्य से संभव नहीं था । क्योंकि हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा जी से वरदान मिला हुआ था ।


जब हरीनाकश्यप अमर होने के लिए तपस्या करने लगा ।वह बर्ह्म जी की घोर तपस्या में लग गए सालों साल तपस्या करते रहे बहुत दिनों तक तपस्या करने के बाद जब बर्ह्म जी आकर  उनसे पूछा कि वत्स वरदान मांगो। तो वह बड़ी ही बड़ी ही विनम्रता से हाथ जोड़ कर कहा हे जगत के पालनकर्ता अगर आप मेरे तपस्या से प्रसन्न है तो मुझे अमरत्व का वरदान दे कर मुझे अमर कर दे।
बर्ह्म जी ने बोले हे असुर राज अमरत्व का वरदान में नहीं दे सकता इसके सिवाय तुम जो भी कुछ मांगोगे में देने के लिए तैयार हूँ। पर वो मन नहीं और बोला मुझे अमर ही होना है इसके अलावा मुझे कुछ नहीं चाहिए। इतना कह वह फिर से तपस्या में लग गया। ऐसे ही कितनी बार बर्ह्म जी आये  पर वह हर एक बार यही  बोले कि मुझे अमर कर दीजिए ब्रह्माजी बोले अमर करना मेरे हाथों में नहीं है जो जीव जन्म लिया है उसे मरना पड़ेगा यही बिधि का विधान है। पर वो नहीं मना । इस घनघोर तपस्या को देख देवता लोग भी  पर डरने लगे , उन्हें ये दर सताने लगा की यदि ये अमर का वरदान प् लेता है तो कंही हम लोग से स्वर्ग न छीन ले । तप इतना प्रचंड था की  ठंडी के दिन में पानी में खड़ा होकर गर्मी के दिन में चारों तरफ आग जलाकर असुर  घोर तपस्या करता रहा अंतिम में ब्रह्माजी बोले वत्स मैं तुम्हें अमरता का वरदान नहीं दे सकता तुम चाहो तो और कुछ मांग सकते हो हिरण्यकश्यप ने सोचा कि मैं कुछ ऐसा मांगूंगा जो अमर से कम ना उसने बर्ह्म  जी से मांगा  दिन में भी ना मरु और रात में भी ना मरू , अस्त्र से ना मरु ना ही शस्त्र से मरु , सुबह भी  न मंरु शाम को भी ना मरू ,  दिन में भी नहीं और रात में भी नहीं,  घर में भी नहीं बाहर में भी नहीं,ना मनुष्य से ना पशु से  मेरी मोत नहीं हो । यह सब वरदान बड़ी सोच उसने माँगा समझकर मांगा । हरिणकश्यप की बाते सुन बर्ह्मजी कुछ सोचे फिर  उन्हें तथास्तु कह दिए उन्हें यह वरदान दे दिया वरदान पाकर अपने आपको वह अमर समझकर तीनों तीनों लोगों को अपने अधिकार में ले लिया यही कारण था कि वह अपने आप को भगवान घोषित करके सबसे पूजा करवाता क्योंकि भगवान भी अमर होते हैं और उसने सोचा मैं भी अमर हूं ।

ऎसे ही बहुत दिनों तक चलता रहा ।बहुत दिनों के बाद उसके घर एक बालक का जन्म हुआ बालक का नाम रखा गया प्रह्लाद । प्रह्लाद का जन्म होते ही राजा रानी ख़ुशी से झूम उठे। बड़े ही लाड़ से प्रह्लाद का पालन पोसन होने लगा । जब वे पाठशाला जाने लायख हुए तो माता पिता उसे गुरु जी के आश्रम शिक्षा के लिए भेज दिया। आश्रम में वो पढ़ाई के साथ - साथ श्री हरी नाम संगकृतंन् करने लगा और अपने साथ पड़ने वाले बच्चों को भी भजन कीर्तन करवाने लगा।वे पढ़ाई कम हरी भजन में ज्यादा मन लगता था। ये   नारायण नारायण  जप सब बच्चों से करवाता था।उसके गुरु को जब इस बात का पता चला तो उसे बहुत बार समझाया की तुम दुश्मन का नाम क्यों ले रहे हो यदि ये बात तुम्हारे पिता जी के पास पहुँचा तो तुम्हारे लिए और मेरे लिए भी ठीक नहीं होगा।  पर प्रह्लाद पर इसका कोई असर नहीं हुआ। कितने बार गुरु जी से उन्हें मर भी पड़ी। थक रार कर गुरु जी उन्हें महराज के पास ले गए और पूरी कहानी सुनाया। प्रह्लाद के पिजा जी भी उन्हें समझाया और दुश्मन ला नाम न लेने की बात कही पर प्रह्लाद नहीं माना । वह तो मानो हरी रंग में रंग चूका था । उलटा अपने पिताजी को ही समझाने लगे हे पिता जी आप जिसका नाम जपने  से हमें मना कर रहे है आपको पता है , वही संसार के सार है , वही सब का पालन करता है , वही सबके माता-पिता है ,वही सबके भाई बन्धु सखा है , वही पुरे डांसर के रचेता है , वही संसार के कण-कण में है । इस लिए पिता जी आप भी मेरे साथ उनके शरण में आ जाइये आपका भला होगा। 


तब हिरण्यकश्यप को बहुत गुस्सा आया और अपने सैनिको को प्रह्लाद को मारने का हुक्म दे दिया । प्रह्लाद को मारने के लिए सैनिकों ने उसे  पहाड़ की  चोटियों से नीचे फेंक दिया उतना दूर से गिरने पर भी प्रह्लाद को लगा कि वह फूलों की सेज पर आकर गिरा हो। उसके बाद  सैनिकों ने उसे  जहरीले सांपों से भरे कुएं में उसे छोड़ दिया वह सांप भी  उसको नहीं काटा । उसके बाद  खोलते हुए तेल में प्रह्लाद को बैठा दिया गया उसके बाद भी प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ वह हरि का नाम लेते रहा।अंतिम में हिनाकश्यप थक हार कर अपनी बहन होलिका से बात की होलिका को ब्रह्मा जी से   आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका ने अपने भाई से कहा   महाराज आप मुझे एक मौका दें मैं इसे जला के मार दूंगी क्योंकि मैं आग में जलती नहीं हूं और एक लकड़ी के ढेर में बैठ गई और सैनिकों से बोली कि  आग लगा दो क्योंकि होलीका तो जलेगी नहीं प्रह्लाद जल के मर जाएगा लकड़ी के ढेर में आग लगा दी गई आग जला होलिका जल गई प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। सब तरह से जतन कर के देख लेने के बाद जब प्रह्लाद बध नहीं हुआ तो अंत में भरी सभा में हिरनाकश्यप प्रह्लाद से पूछा कि  इतना जतन करने के बाद भी तुम्हें मृत्यु नहीं आई तुम्हारे भगवान कहां है मैं देखना चाहता हूं और नहीं तो मैं तुम्हें अभी अपने तलवार से मार दूंगा बताओ तुम्हारे भगवान कहां प्रह्लाद ने बड़ी मासूमियत से कहा पिताजी भगवान हर एक कण - कण में है  जल में थल में अग्नि में आकाश पाताल पवन में हममें तुममें तलवार में इस खंभा( सामने खम्भे की और इसरा करते हुआ) में सब जगह हरी  विराजमान है बस उनको देखने के लिए एक भक्त की आंख होनी चाहिए इतना बात सुनकर हरीनाकश्यप ने अपनी गधा उठाए और बोले कि   तुम्हारा भगवान हर एक जगह है तो  तुम्हारा भगवन इस खंभे मैं भी निकलना चाहिए प्रह्लाद ने कहा हाँ  जरूर  निकलेगा तब हिरण्यकश्यप ने अपने गदा से  उसको उस खम्भे पर प्रहार किया ।


प्रहार इतना जोरदार था की खंभा भरभरा का जमीन पर बिखर गया। तब उसी टूटे हुआ खम्भे के जगह से  भगवान नरसिंह (नरहरि) विराजमान थे नरसिंह का  मतलब शरीर नर (मनुष्य ) का और सर सिंह का इसलिए उन्हें नरहरी भगवान भी कहा जता है या नरसिंह नरसिंह भगवान कहा जाता है । नरसिंह को हरीनाकश्यप जेसे ही मारने उठा भगवन ने  अपने भुजाओं से उठा लिया  और ले जाके घर और बाहर के बीच देहरी( दरवाजा या  चौखट) पर बैठ गये।और  हरीनाकश्यप को अपने गोदी रख लिया। सोचने वाली बात है की ब्रह्मा जी से जो उन्हें वरदान मिला था उसमें यह था कि घर में ना बाहर में तो नरहरी जी उन्हें घर में भी नहीं और बाहर में भी नहीं जो घर का डेयरी बना होता है वह घर भी नहीं होता और बाहर भी नहीं होता उसमें बैठ गए ना दिन ना रात सूरज डूबने के बाद और अंधेरा होने से पहले का जो समय होता है वह न दिन होता है और ना रात होता है वह संध्या काल कहा जाता है । अस्त्र से ना शस्त्र उनके पास कोई अस्त्र था ना कोई शस्त्र था उनके पास बड़े-बड़े नाखून थे। और एक बात ना मनुष्य पशु वह न मनुष्य थे और ना पशु  दोनों का मिल कर नरसिंह बने है  धड़ ( शारीर)  मनुष्य का का और सिर सिंह का देहरी पर बैठकर उन्होंने अपने गोदी में हरीनाकश्यप को लेकर अपने नाखूनों से उसका अदर (छाती) चीर दिया  और उनका वध कर दीये।
बधकरने के बाद जोर-जोर से गर्जना करने लगे गर्जना इतना भयंकर था कि तीनों लोग इससे भयभीत हो गए सब देवी देवता वहां पहुंचे और सबने  जाकर प्रह्लाद से कहा कि प्रह्लाद तुम ही इन्हें शांत  कर सकते हो तुमसे ही शांत होंगे तब जाकर प्रल्हाद में नरहरी जी को शांत करने के लिए प्रर्थना किया तब भगवन शांत हो गए।  सभी देवी देवता मिलकर भगवन नरसिंह जी स्तुति की और हरीनाकश्यप का राज प्रह्लाद को सौंप कर सब अपने-अपने घर चले गए गए । आगे चलकर यह प्रह्लाद बहुत ही प्रतापी राजा बने । हरीनाकश्यप के लिए ही  श्री विष्णु भगवान को नरसिंह का अवतार लेना पड़ा ये बिष्णु जी की दश अवतारों में से एक हैं ।।                            बोलिए एक बार नरसिंह  भगवान                              की जय।
चरित्र

क्या आप जानते है ? हनुमान जी को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है।

रामायण की रोचक कहानिया राम बड़ा या राम की नाम।

क्यों रहना पड़ा था सीता जी को श्री लंका में ?

भारत का सबसे बड़ा मंदिर कँहा पर स्थित है।

क्यों नहीं हो सका था श्री राम जी और सीता का विवाह शुभ महुर्त में?



रविवार, 20 अक्टूबर 2019

चरित्र (Character)

चरित्र शब्द दिमाग में आते ही एक ही व्यक्ति की छवि मन में उभरती है श्री राम जी । एक ही सबसे ज्यादा चरित्रवान मनुष्य पूरे ब्रह्मांड में हैं हुए हैं श्री रामचंद्र जी । यदि चरित्र अपनाना हो तो इन्हीं का चरित्र अपनाना चाहिए ।
Pauranik ktha

ऐसे तो श्री राम जी चरित्र , मर्यादा , पितृ भक्ति, दयालुता की खान है । इसलिए उनका एक और भी नाम है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम । चरित्र मनुष्य की बहुत बड़ी पूंजी होती है जो मनुष्य को बहुत कष्टों से बचाती है ।
Ram katha Ram bada ya ram kanam

यदि आपका चरित्र साफ है तो आपको गांव , समाज , कुटुंब में आपका मान प्रतिष्ठा की बृद्धि होगी । समाज के लोग आपको सम्मान के दृष्टि से देखेंगे समाजिक कार्यों में आपको ऊंचा स्थान प्राप्त होगा ।
Ramayan-hindi-story.

उदाहरण के तौर पर यदि आप किसी गांव मोहल्ले में रहते हो आपका चरित्र साफ सुथरा है ये सबको पता है । आप कोई भी बुरा काम नहीं करते हैं कभी किसी से लड़ाई नहीं करते हैं कोई बुरी संगत में नहीं रहते हैं ।
Largest temple of india

संयोगवश आपका किसी से झगड़ा हो जाता है लड़ाई झगड़ा में कब किसको गाली गलौज कर दे या मारपीट कर दे पता नहीं चलता आदमी कितने भी शांत स्वभाव के हो गुस्से में कुछ ना कुछ हो ही जाता है ।


उसके बाद जिससे आपका झगड़ा हुआ है वह आपको पंच के सामने खड़ा करेगा यह आप पर कोर्ट में केस कराएगा । उस समय आपको अपने स्वच्छ और साफ-सुथरी चरित्र का लाभ मिलेगा । यदि गलती उसकी है तो सब लोग आपके साथ रहेंगे ही , पर यदि गलती आपका भी हो तो भी के पक्ष में बहुत से लोग खड़े रहेंगे और दूसरे लोगों को भी यह समझाने की कोशिश करेंगे की यह आदमी ऐसा गलती है नहीं कर सकता क्योंकि यह आदमी एक चरित्रवान आदमी है।


 इसका चरित्र साफ है । भले ही इस झगड़े में आपका ही दोस्त क्यों ना हो पर साफ-सुथरी चरित्र के कारण आपको ही जीत मिलेगी चाहे गांव के पक्ष में हो या कोट मैं जज के सामने और और यदि आपका दोष सिद्ध भी हो जाता है तो भी आपका पिछला रिकॉर्ड देखते हुए आपसे नरमी बरती जा सकती है ।


इसलिए अपने चरित्र को साफ रखिए कभी भी ऐसा काम मत कीजिए जो समाज के नजर में गलत हो यदि आप गलत काम के आदि है आप शराब पीते हैं जुआ खेलते हैं या ऐसा कोई भी काम करते हैं जिसने समाज को गंदा करता हो तो आप पर कोई विश्वास नहीं करेगा यदि आप किसी से झगड़ते हैं ।


तो आपका दोष नहीं रहने पर भी सबके नजर में आप ही गुनहगार होंगे और सब कोई आप ही को दोषी पर ठहराएंगे । इसलिए अपने आप को गलत कामों से दूर रखें श्री राम के बताए हुए मार्ग पर चलने की कोशिश करें यदि आप उसमें तो चार परसेंट भी बताएं मार्ग पर चलते हैं तो आप घर गृहस्ती में कभी असफल नहीं होंगे और अपने गृहस्थ जीवन को बड़े ही आसानी और कुशलता के साथ चला पाएंगे ।                                                                 ।।जय श्री राम।।              

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

क्या आप जानते हैं ? हनुमान जी को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है।

 You know? Why is vermilion offered to Hanuman ji.                                                 Kya aap jante hai Hnuman ji ko sindur kyo chadaya jata hi.

हिंदू धर्म के अनुसार यह माना जाता है कि सिंदूर सिर्फ देवियों को चढ़ाया जाता है पर हनुमान जी ऐसे देवता हैं जिन्हें सिंदूर चढ़ाया जाता इसका कारण भी बहुत मजेदार है ।


बात उस समय की है जब श्री रामचंद्र जी बनवास से लौटकर अपने राजकाज में रम गए थे । प्रजा बहुत खुशहाल थी ऐसे राजा पाकर पूरे अयोध्या नगर में प्रजा बहुत खुश थे और रामचंद्र भी अपने प्रजा को अपने पुत्र के समान मानकर राज करते थे ।


हनुमान जी अयोध्या में ही थे एक दिन माता सीता अपने महल में सिंदूर लगा रही थी । माता को सिंदूर लगाते देख हनुमान जी बड़ी कोतुहल के साथ देख रहे थे । एक तो जाति के बंदर और दूसरे हनुमान जी अपने स्वभाव से चंचल उन्हें यह सोचकर बड़ी आश्चर्य हो रहा था कि आखिर माता यह लाल चीज अपने सर पर क्यों लगा रहे हैं।


 हनुमान जी धीरे धीरे माता सीता के करीब गए और बड़ी उत्सुकता के साथ माता जी से पूछ लिया हे माते आप यह लाल चीज क्या लगा रही हैं । माता को हनुमान जी के आवाज में एक निश्चल , अबोध बालक का आवाज सा प्रतीत हुआ । हनुमान जी से माता सीता का रिश्ता एक बेटे की तरह ही था और हनुमान जी भी सीता जी को अपनी मां हे मानते थे ।


ऐसा सवाल सुन मां सीता ने हनुमान जी को समझाते हुए बोले यह सिंदूर है शादीशुदा महिलाएं इसे अपने मांग में लगाती हैं । फिर हनुमान जी ने बड़ी भोलेपन से कहें इससे लगाने से फायदा क्या होता है सीता जी कोई जवाब नहीं सूझा उसने सोचा सीधा- साधा सा कोई जवाब इनको दे देता हूं नहीं तो यह ऐसे ही मुझे सताता रहेगा ।


 माता सीता ने हनुमान जी से कहे यह सिंदूर लगाने से आपके स्वामी और मेरे पति श्री रामचंद्र जी बहुत प्रसन्न हो जाते हैं ।इतना कह सीता जी हनुमान जी से पिंड छुड़ा कर दूसरी तरफ चली  गई । हनुमान जी वहां बैठे बैठे सोचने लगे । उधर सीता जी हनुमान जी को समझाने के बाद श्री रामचंद्र के पास जाकर बैठ गए और हनुमान जी से हुए वार्तालाप को राम जी की सुना रहे थे कह रहे थे की हनुमान कैसे एक बालक की तरह मुझसे सवाल पर सवाल किए जा रहे हैं थे ।


 यह सब बात हो ही रहा था की अचानक दोनों की नजर उधर से आते हुए हनुमान जी पर पड़े पहली नजर में तो वे समझ ही नहीं पाए थे कि यह कौन है क्योंकि उनका पूरा शरीर लाल ही लाल वह अपने पूरे शरीर में सिंदूर लगाकर लाल हो गए थे । राम जी हंसते- हंसते हनुमान जी से बोले हे हनुमान आपने अपना यह दशा कैसी बना ली हनुमान जी सामने आकर हाथ जोड़कर बोल।


 हे प्रभु माताजी सिंदूर लगा रही थी तब मैंने पूछा कि आप सिंदूर क्यों लगा रहे हैं तब माताजी ने मुझसे कहीं की सिंदूर लगाने से आप प्रसन्न हो जाते हैं इसलिए माता ने सिंदूर लगाई मैंने सोचा यदि थोड़ा सा सिंदूर लगाने से आप खुश हो जाते हैं तो क्यों ना मैं पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लू इससे आप कितना खुश हो जाएंगे । हनुमान जी के बातों से राम और सीता जी बहुत प्रसन्न हुए उनके सेवा भाव अपने स्वामीको खुश करने की सोच वे बहुत प्रसन्न हुए ।


 सच्चा सेवक का काम हमेशा ही अपने मालिक को खुश रखने का होता है और यह तो पूरा संसार जानती है कि हनुमानजी से बड़ा कोई सेवक नहीं हुआ । हनुमान जी के सेवा भाव से श्री रामचंद्र जी और माता सीता जी ने हनुमान जी को यह आशीर्वाद दिया की आज से तुम्हें जो सिंदूर चढ़ आएगा उसकी हर एक मनोकामना पूर्ण होगी । इसलिए हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाया जाता है।
               (स्रोत रामायण)